23 अगस्त 2025
छत्तीसगढ़ का दुर्ग जिला, जिसे 1 जनवरी 1906 को क्षेत्रीय पुनर्गठन के बाद बनाया गया था, का इतिहास कई बदलावों और विकास की कहानियों से भरा है। उस समय वर्तमान के राजनांदगांव और कबीरधाम जिले भी दुर्ग जिले का हिस्सा थे।

26 जनवरी 1973 को दुर्ग जिले का विभाजन हुआ और राजनांदगांव नया जिला बना। 6 जुलाई 1998 को राजनांदगांव से कबीरधाम का निर्माण हुआ। दुर्ग जिले की भूमि, पहले रायपुर जिले का एक तहसील थी। 1906 में दुर्ग, बेमेतरा और बलोद तीन तहसीलों वाला जिला था। फिर 1 जनवरी 2012 को दुर्ग जिले का पुनः विभाजन हुआ और बेमेतरा तथा बलोद जिले अस्तित्व में आए।

दुर्ग का नाम इतिहास में भी महत्वपूर्ण भूमिका दर्शाता है। लगभग 10वीं सदी ईस्वी में बधलदेश (मिर्जापुर) से आए जागग, रतन देव रतनपुर के खजांची बने। उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए राजा ने उन्हें दुर्ग और 700 गांवों का इनाम दिया। आज राजपूत संग्रहालय में संरक्षित शिलालेख में शिवपुर और शिवदुर्ग का उल्लेख मिलता है। संभवतः सीओदुर्ग का नाम शिवदुर्ग और शिवनाथ नदी से आया।

1741 में मराठाओं ने छत्तीसगढ़ क्षेत्र पर अभियान चलाया और दुर्ग पर कब्ज़ा किया। उन्होंने शहर के ऊँचे स्थान पर शिविर बनाकर क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया। यहां बुद्धकालीन मूर्तियां और कई पत्थर के चरणस्थल पाए गए हैं। जटपाल द्वारा निर्मित हनुमान मंदिर भी दुर्ग के भीतर स्थित है।

शहर में एक विशाल जलाशय, हरपा-डांधे, रेलवे स्टेशन के पास टुंका-झरौनी टीले से खुदाई कर बनाया गया। इस जलाशय ने क्षेत्र के जल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1950 के दशक में भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना के बाद दुर्ग आर्थिक दृष्टि से तेजी से विकसित हुआ। इसने न केवल स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर दिए, बल्कि क्षेत्र की अन्य आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला। दुर्ग जिले का यह सफर यह दर्शाता है कि यहां के भविष्य में और भी उज्जवल आर्थिक और सांस्कृतिक संभावनाएं हैं।

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