रायपुर, 25 अगस्त। जन संस्कृति मंच रायपुर द्वारा रविवार को स्थानीय वृंदावन हॉल में आयोजित ‘सृजन संवाद’ कार्यक्रम ने श्रोताओं को गीत, ग़ज़ल, कविता और संस्मरणों की विविध छटा से विभोर कर दिया। कार्यक्रम में नवोदित और वरिष्ठ रचनाकारों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया और श्रोताओं ने उत्साहपूर्वक सराहना की।

कार्यक्रम की शुरुआत लोक गायिका सुनीता शुक्ला ने गोरख पांडेय का लोकप्रिय गीत “गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो, अजदिया हमरा के भावेले” प्रस्तुत कर की। वहीं गायिका वर्षा बोपचे ने आलिम नक़वी की सामयिक ग़ज़ल का तरन्नुम में पाठ कर समां बाँध दिया –
“चिराग आंधियों में जलाते रहेंगे, ग़मों में भी हम मुस्कुराते रहेंगे।”

वरिष्ठ साथी नरोत्तम शर्मा ने अपने गांव बंगोली की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका का उल्लेख किया और रचनाकारों को गांव आने का आमंत्रण दिया।
डॉ. नरेश गौतम ने कोरोना काल में लिखी कविता “मैं डरता हूं” सुनाई, वहीं जनकवि भागीरथी प्रसाद वर्मा ने छत्तीसगढ़ी कविता में सत्ता और पूंजीपतियों की विसंगतियों को उजागर किया।

युवा रचनाकार प्रतीक कश्यप की ग़ज़लों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। डॉ. रामेश्वरी दास ने गीत “कलम मुझे सच-सच बतलाना” गाकर समां बाँध दिया। शायर आरडी अहिरवार की पंक्तियाँ –
“मुजरिमों को खुश, मगर हमको ख़फ़ा रखा गया,
कटघरे में देर तक, हमको खड़ा रखा गया।”

– ने खूब तालियां बटोरीं।

वरिष्ठ लेखिका वंदना कुमार और संजीव खुदशाह ने क्रमशः कोरोना काल की त्रासदी और जातीय भेदभाव पर कविताएं सुनाईं। पत्रकार डॉ. अरुण जायसवाल ने विदर्भ के किसानों की दुर्दशा पर मार्मिक संस्मरण प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने युवा रचनाकारों को मार्गदर्शन भी दिया। कथाकार मनोज रूपड़ा ने कहा – “दूसरों के दुख में शामिल हुए बिना बड़ा रचनाकार बनना असंभव है।” वहीं आलोचक सियाराम शर्मा ने कहा – “जो रचेगा वही बचेगा। रचना आत्मसंघर्ष है, और एक बेहतर रचनाकार प्रेम और क्रांति दोनों को जानता है।”

जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सचिव राजकुमार सोनी ने रचनाकारों से जुड़ने का आह्वान किया और कहा कि “प्रतिरोध की ताकत को बनाए रखने के लिए सृजनात्मक हस्तक्षेप जरूरी है।”

कार्यक्रम का संचालन रूपेंद्र तिवारी ने किया और सह सचिव अजय शुक्ला ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. संजू पूनम, दिलशाद सैफी, विजेंद्र अजनबी, सुरेश वाहने, विप्लव बंधोपाध्याय, कल्याणी, भूपेश नन्हारे और गणेश सोनकर सहित अनेक सहयोगियों की भूमिका रही।

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