Chhattisgarh University investigation permission: छत्तीसगढ़ में विश्वविद्यालयों से जुड़े अधिकारी-कर्मचारियों की जांच को लेकर एक नया प्रशासनिक आदेश राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। ताजा निर्देश के अनुसार, अब किसी भी विश्वविद्यालय कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले लोक भवन (राजभवन सचिवालय) से सरकार को अनुमति लेनी होगी।

इस आदेश के सामने आते ही विपक्षी दल कांग्रेस ने राज्य की भाजपा सरकार और राज्यपाल के बीच कथित असमंजस और समन्वय की कमी पर सवाल उठाए हैं।


कांग्रेस का आरोप: भरोसे का संकट

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने इस आदेश को चिंताजनक बताते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो सरकार राजभवन का भरोसा खो चुकी है
उन्होंने आरोप लगाया कि—

  • कुछ मामलों में राजभवन सीधे निर्णय ले रहा है
  • यह निर्णय अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिए जा रहे हैं
  • विश्वविद्यालय कर्मचारियों की जांच से पहले अनुमति की शर्त शासन व्यवस्था को कमजोर करती है

कांग्रेस का कहना है कि राज्य सरकार को इस पूरे विषय पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि भ्रम की स्थिति न बने।


राज्यपाल की सक्रियता पर पहले भी सवाल

राज्यपाल रमेन डेका के कार्यभार संभालने के बाद से ही उनकी सक्रिय भूमिका चर्चा में रही है। वे इससे पहले भी कई जिलों में जाकर प्रशासनिक अधिकारियों की बैठकें ले चुके हैं।
इसी को लेकर कांग्रेस लगातार यह सवाल उठाती रही है कि—

“जब प्रदेश में निर्वाचित सरकार कार्यरत है, तो राज्यपाल की इतनी सक्रिय भूमिका की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?”

विपक्ष ने यहां तक कहा कि क्या प्रदेश में आपातकाल जैसी स्थिति है, जो राज्यपाल को जिलों में जाकर प्रशासनिक समीक्षा करनी पड़ रही है।


सरकार का पक्ष: प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा

हालांकि, इस मुद्दे पर राज्य सरकार ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज किया है।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि—

  • राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होते हैं
  • वे विश्वविद्यालय के सर्वोच्च प्रशासनिक प्रमुख भी होते हैं
  • ऐसे में यदि कोई निर्णय प्रशासनिक दृष्टि से लिया गया है, तो उसे असामान्य नहीं माना जाना चाहिए

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आदेश प्रशासनिक समन्वय के तहत जारी किया गया है, न कि किसी टकराव के कारण।


राजनीतिक बहस के केंद्र में आदेश

फिलहाल, Chhattisgarh University investigation permission से जुड़ा यह आदेश राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
जहां विपक्ष इसे संवैधानिक संतुलन से जोड़कर देख रहा है, वहीं सरकार इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बता रही है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह आदेश केवल प्रक्रिया का हिस्सा है या फिर राज्य की राजनीति में किसी नए टकराव की भूमिका तैयार कर रहा है।

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