Raipur Sahitya Utsav Patrakarita Aur Sahitya।
रायपुर साहित्य उत्सव के तीसरे और अंतिम दिन लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित दूसरे सत्र में “पत्रकारिता और साहित्य” विषय पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा संपन्न हुई। यह सत्र स्वर्गीय श्री बाबन प्रसाद मिश्र की स्मृति को समर्पित रहा।

इस परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्रीमती स्मिता मिश्रा, डॉ. हिमांशु द्विवेदी, श्री अवधेश कुमार और श्री गिरीश पंकज ने अपने विचार साझा किए। सत्र का कुशल संचालन श्री विभाष झा ने किया।


✍️ जनहित और सामाजिक जिम्मेदारी लेखन की आत्मा

वरिष्ठ पत्रकार श्री गिरीश पंकज ने कहा कि चाहे पत्रकारिता हो या साहित्य, लेखन की जड़ें हमेशा जनहित और सामाजिक जिम्मेदारी में होनी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि लेखनी तभी सार्थक है, जब वह समाज के प्रश्नों से जुड़ती है और आमजन की आवाज बनती है।


📰 पत्रकारिता तथ्य है, साहित्य उसका विस्तार

हरिभूमि के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि पत्रकारिता का मूल आधार तथ्यों को वस्तुनिष्ठ और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करना है, जबकि साहित्य उन्हीं तथ्यों और परिस्थितियों पर गहन चिंतन कर व्यापक दृष्टिकोण विकसित करता है।

उन्होंने पत्रकार और साहित्यकार के अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि

  • पत्रकार संस्थागत सीमाओं, मूल्यों और संपादकीय नीति के अंतर्गत कार्य करता है
  • वहीं साहित्यकार को विषय के विविध आयामों को स्वतंत्र रूप से अभिव्यक्त करने की आज़ादी होती है

🖋️ शैली का अंतर, संवेदना समान

वरिष्ठ पत्रकार श्रीमती स्मिता मिश्रा ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य में अंतर मुख्यतः शैली, भाषा और प्रस्तुति का होता है।
जहां पत्रकारिता तथ्य प्रधान होती है, वहीं साहित्य भावनाओं और संवेदनाओं को अधिक महत्व देता है।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि भाषा में संवेदनशीलता, रिपोर्टिंग में सहानुभूति और व्यापक दृष्टिकोण – ये दोनों ही क्षेत्रों की साझा शक्ति हैं, क्योंकि दोनों सामूहिक चेतना को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।


📖 पत्रकारिता और साहित्य: एक ही सिक्के के दो पहलू

अपने अनुभव साझा करते हुए श्री अवधेश कुमार ने पत्रकारिता और साहित्य को एक ही सिक्के के दो पहलू बताया।
उन्होंने कहा कि उनकी कई साहित्यिक रचनाएं पत्रकारिता के दौरान सामने आई मानवीय कहानियों और सामाजिक यथार्थ से प्रेरित रही हैं।


🌐 सोशल मीडिया की भूमिका पर भी चर्चा

सत्र के दौरान श्री विभाष झा ने छत्तीसगढ़ के महान पत्रकारों मुक्तिबोध और माधवराव सप्रे के योगदान को स्मरण किया, जिन्होंने साहित्य को सामाजिक चेतना का माध्यम बनाया।
इसके साथ ही समकालीन पत्रकारिता में सोशल मीडिया के प्रभाव और चुनौतियों पर भी गंभीर विमर्श हुआ।


📚 काव्य संग्रहों का विमोचन

इस अवसर पर

  • श्रीमती स्मृति दुबे का काव्य संग्रह “करुण प्रकाश”
  • तथा श्री लोकनाथ साहू ललकार का काव्य संग्रह “यह बांसुरी की नहीं बेला है”

का विमोचन मंचासीन अतिथियों के कर-कमलों से संपन्न हुआ।


Raipur Sahitya Utsav Patrakarita Aur Sahitya विषयक यह परिचर्चा न केवल विचारों का संगम थी, बल्कि यह संदेश भी दे गई कि पत्रकारिता और साहित्य – दोनों का उद्देश्य समाज को जागरूक करना और मानवीय मूल्यों को सशक्त बनाना है।

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