sweeper teaching in government school: छत्तीसगढ़ के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय से सामने आया एक वीडियो पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। सरगुजा जिले के लखनपुर विकास खंड के जमझोर गांव में एक ऐसा नजारा देखने को मिला, जो ग्रामीण भारत की शिक्षा व्यवस्था की कड़वी सच्चाई बयान करता है।

इस स्कूल में नियुक्त शिक्षक गायब थे और उनकी जगह एक सफाईकर्मी बच्चों को पढ़ाते हुए दिखाई दिए। यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और देशभर में चर्चा का विषय बन गया।

क्या है पूरा मामला?

जमझोर प्राथमिक विद्यालय में आधिकारिक तौर पर एक प्रधानाध्यापक और दो अन्य शिक्षक तैनात हैं। लेकिन स्कूल के घंटों के दौरान कोई भी शिक्षक मौजूद नहीं था।

ऐसे में स्कूल के सफाईकर्मी ने जिम्मेदारी संभाली और बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। ब्लैकबोर्ड पर पाठ लिखे गए थे, बच्चे चुपचाप बैठे थे और कक्षा चल रही थी – बस शिक्षक की जगह एक सफाईकर्मी खड़ा था।

यह स्थिति एक कड़वी सच्चाई उजागर करती है: स्कूल की इमारत मौजूद है, नामांकन है, लेकिन पढ़ाने वाले शिक्षक गायब हैं।

प्रधानाध्यापक का जवाब और सवाल

जब इस लापरवाही के बारे में पूछा गया, तो प्रधानाध्यापक ने कहा कि उन्हें इस स्थिति की जानकारी नहीं थी और वे जानकारी जुटाएंगे।

यह जवाब चिंता को और गहरा करता है। अगर संस्था का प्रमुख यह नहीं जानता कि कौन पढ़ा रहा है, तो यह व्यवस्था में निगरानी की पूर्ण विफलता को दर्शाता है।

शिक्षकों की अनुपस्थिति: राष्ट्रीय तस्वीर

यह घटना केवल एक गांव के स्कूल की कहानी नहीं है। भारत में शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (ASER) 2024 के अनुसार, सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की औसत उपस्थिति 87.5 प्रतिशत तक बढ़ी है।

हालांकि यह सुधार है, फिर भी इसका मतलब है कि हर दस में से एक से अधिक शिक्षक किसी सामान्य दिन गायब रहते हैं।

इसके अलावा, ASER 2023 की रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा कमजोर बनी हुई है। कक्षा 3 से 8 के कई छात्र कक्षा 2 स्तर का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते या अपनी कक्षा के अनुरूप बुनियादी गणित नहीं कर पाते।

संरचनात्मक समस्याएं

यूनेस्को की शिक्षा रिपोर्ट 2021 ने ग्रामीण शिक्षा में संरचनात्मक कमियों को उजागर किया था:

  • लगभग 1,20,000 एकल-शिक्षक स्कूल मौजूद हैं
  • इनमें से 89 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं
  • देश में करीब 11 लाख शिक्षकों की कमी है

ये आंकड़े बताते हैं कि शिक्षकों की कमी और कमजोर निगरानी वंचित बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करती है।

बच्चों पर असर

शिक्षकों की अनुपस्थिति का सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ता है। सीखने का कीमती समय बर्बाद होता है, खासकर उस उम्र में जब बच्चे पढ़ना, लिखना और गिनती सीखते हैं – ये वो कौशल हैं जो जीवनभर काम आते हैं।

इसके अलावा, माता-पिता का सरकारी शिक्षा व्यवस्था में विश्वास कमजोर होता है। गरीब परिवारों के लिए यह और भी चिंताजनक है, क्योंकि उनके पास निजी स्कूलों का विकल्प नहीं होता।

जवाबदेही का सवाल

जमझोर स्कूल में नियुक्त कर्मचारी मौजूद हैं, फिर भी पढ़ाने की जिम्मेदारी एक सफाईकर्मी पर आ गई। यह एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है: अगर शिक्षक गायब हैं, तो जवाबदेही कौन सुनिश्चित करेगा?

यह घटना केवल शिक्षकों की उपस्थिति का मामला नहीं है। यह प्रशासनिक निगरानी, पर्यवेक्षण में खाई और नियुक्तियों तथा वास्तविक कक्षा शिक्षण के बीच की दूरी को दर्शाती है।

आगे क्या?

जैसे-जैसे यह वीडियो वायरल हो रहा है और ध्यान बढ़ रहा है, अब फोकस इस बात पर है कि क्या अधिकारी कार्रवाई करेंगे – और क्या कक्षाओं में वे शिक्षक होंगे जहां उन्हें होना चाहिए।

प्रशासन के लिए यह एक परीक्षा है कि क्या सामने आने के बाद कार्रवाई होती है। बच्चों का भविष्य इसी पर निर्भर करता है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ के इस सरकारी स्कूल में सफाईकर्मी द्वारा बच्चों को पढ़ाने की घटना ने भारत की ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता सामने ला दी है। यह केवल एक स्कूल का मसला नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में जवाबदेही और निगरानी की कमी का प्रतीक है।

आंकड़े और रिपोर्टें तो पहले से चेतावनी दे रही थीं, लेकिन यह वीडियो उन आंकड़ों को जमीनी हकीकत में तब्दील कर देता है। अब देखना यह है कि क्या यह घटना सिर्फ चर्चा बनकर रह जाएगी या वास्तविक बदलाव की शुरुआत होगी।

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